रिपोर्ट : LegendNews
पाक सेना के पूर्व ब्रिगेडियर ने कहा, सिंधु जल संधि पर भारत के सामने हम बेबस
पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने अपने देश में स्वतंत्रता दिवस के मौके पर 14 अगस्त को सिंधु जल संधि पर भारत को गीदड़भभकी दी थी। उन्होंने कहा था कि सिंधु जल का एक एक बूंद पानी पाकिस्तान के लिए रेड लाइन है। लेकिन पाकिस्तानी सेना के पूर्व ब्रिगेडियर डॉ. राशिद वली जंजुआ ने डॉन में लिखे एक लेख में कहा है कि 'सिंधु जल संधि पर पाकिस्तान भारत के सामने बेबस है और उसके सामने तमाम कानूनी विकल्प खत्म हो चुके हैं।' उन्होंने 24 जून को 'डॉन' में ही लिखे गये एक लेख का हवाला दिया है जिसमें सिंधु जल संधि पर भारत की कानूनी घेराबंदी की बात कही गई थी।
ब्रिगेडियर डॉ. राशिद वली जंजुआ (रिटायर्ड) ने डॉन में लिखा है कि 'पाकिस्तान कोर्ट ऑफ़ आर्बिट्रेशन (मध्यस्थता न्यायालय), इंटरनेशनल क्रिमिनल कोर्ट (ICC), और मानवाधिकारों के उल्लंघन के लिए संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद (UNHRC) में भारत को घेरने में पूरी तरह से नाकाम रहा है।' उन्होंने लिखा है कि कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन जहां पाकिस्तान पहले ही किशनगंगा/रातले परियोजना का मुद्दा उठा चुका है। 2025 में अदालत ने अपने अधिकार क्षेत्र की पुष्टि की लेकिन भारत ने इसका बहिष्कार किया है। समस्या यह है कि भारत ने गैर-कानूनी रूप से संधि को रोक रखा है और भारत के पीछे हटने के कारण मध्यस्थता के फैसले को लागू नहीं किया जा सकता है।
अंतर्राष्ट्रीय अदालत में क्यों नहीं टिकेगी पाकिस्तान की अर्जी?
डॉ. राशिद वली जंजुआ (रिटायर्ड) ने आगे लिखआ है कि UNHRC के संबंध में चूंकि पाकिस्तान और भारत दोनों ने संबंधित अनुच्छेदों की पुष्टि की है इसलिए कानूनी रास्ता वास्तव में खुला है। लेकिन इस प्लेटफॉर्स से सिर्फ तथ्य-खोज रिपोर्ट और सिफारिशें ही मिल सकती हैं बाध्यकारी आदेश नहीं। भारत इस फैसले को भी नहीं मानेगा। फिर तीसरा रास्ता है इंटरनेशनल क्रिमिनल कोर्ट (ICJ) और भारत भी ICJ के अधिकार क्षेत्र को सशर्त स्वीकार करता हैजिसमें ऐसे देशों के साथ विवाद शामिल नहीं हैं जो कॉमनवेल्थ के सदस्य हैं या रहे हैं लेकिन यहां भी पाकिस्तान भारत पर प्रेशर नहीं डाल सकता है।
उन्होंने लिखा है कि 1997 का UN जलमार्ग कन्वेंशन भी कोई व्यावहारिक रास्ता नहीं देता है क्योंकि न तो पाकिस्तान और न ही भारत ने इसकी पुष्टि की है। एकमात्र कानूनी रास्ता तब खुलता है जब भारत अपनी सहमति दे या संयुक्त राष्ट्र का कोई अंग जैसे महासभा (UNGA) या सुरक्षा परिषद (UNSC) भारत को सीधा आदेश दे। उन्होंने लिखा है कि ऐसे में कानूनी तौर पर एकमात्र व्यावहारिक रास्ता यह है कि भारत के अड़ियल रवैये के बावजूद IWT की शर्तों के तहत 'परमानेंट कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन' (PCA) में यह मुद्दा उठाया जाए।
ICC और UNHRC के दरवाजे भी पाकिस्तान के लिए क्यों बंद हैं?
इसके अलावा पाकिस्तान शांति और सुरक्षा बनाए रखने के लिए अंतरिम उपायों की सिफारिश या 'चैप्टर VII' के तहत बाध्यकारी प्रस्ताव की मांग करते हुए UNGA और UNSC में भी यह मामला उठा सकता है। यह इस बात पर निर्भर करता है कि पाकिस्तान UNSC में कितना समर्थन जुटा पाता है। उन्होंने अंत में लिखा है यह साफ है कि कानूनी घेराबंदी का रास्ता इतना आसान नहीं है और इसमें कई सीमाएं भी हैं। इसलिए IWT को फिर से मजबूत करने पर पूरी तरह ध्यान देने की जरूरत है क्योंकि अंतर्राष्ट्रीय कानून के भारत द्वारा उल्लंघन का मुकाबला करने के लिए यही सबसे असरदार कानूनी रास्ता रहा है और आज भी है।
-Legend News

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