अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने चेतावनी दी है कि अगर उत्तर अटलांटिक संधि संगठन (NATO) के देशों ने अगर होर्मुज स्ट्रेट खोलने में अमेरिका की मदद नहीं की तो इस सैन्य संगठन का भविष्य बेहद बुरा होगा। ट्रंप ने ईरान के खिलाफ जंग में यूरोपीय देशों को अमेरिका की मदद नहीं करने पर साफ-साफ अंजाम भुगतने की धमकी दी है। साफ है कि नाटो देशों में अमेरिका के एक्शन को लेकर दरार नजर आ रही है। यह वही अमेरिका है, जो BRICS को लगातार कमजोर करने की कोशिशों में लगा हुआ है। वहीं, भारत विदेश मंत्री एस जयशंकर ने भी होर्मुज स्ट्रेट को खोले जाने के लिए एक बड़ी बात कही है। भारत का यह दो टूक संकेत अमेरिका के लिए भी है। 
होर्मुज में समुद्री बारूदी सुरंगों से खौफ में है अमेरिका
ईरान से जंग को 17 दिन बीत चुके हैं, मगर अमेरिका के हाथ अब भी कुछ खास नहीं लगा है। ट्रंप ने कहा है कि ईरान को नष्ट करना जरूरी है। उनके पास न तो नौसेना है और न ही एंटी एयरक्रॉफ्ट है और न ही एयरफोर्स है। फिर भी वह लड़ रहा है। ऐसा वह इसलिए कर पा रहा है, क्योंकि उसने पानी में बारूदी सुरंगें बिछा रखी हैं। ट्रंप ने ईरान के होर्मुज स्ट्रेट बंद करने को बड़ी बाधा करार देते हुए कहा है कि यह बाधा बहुत बड़ी समस्या पैदा कर रही है। 
अमेरिका इतना परेशान क्यों है, समझिए मर्म
फाइनेंशियल टाइम्स की एक रिपोर्ट के अनुसार 2022 के बाद पहली बार पिछले हफ्ते तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गई थीं। एनालिस्ट्स ने चिंता जताई थी कि अगर जल्दी होर्मुज नहीं खोला गया तो ये कीमतें 150 डॉलर प्रति बैरल तक जा सकती हैं। इससे अमेरिका समेत पूरी दुनिया में हाहाकार मच सकता है। पहले से परेशान अमेरिका को घरेलू मोर्चे पर महंगाई का जिन्न हालत खराब कर सकता है। 
दुश्मनों के लिए नहीं खुलेगा होर्मुज
ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने कहा है कि होर्मुज खुला हुआ है, मगर ईरान के दुश्मनों खासतौर पर अमेरिका और इजरायल के जहाजों के लिए यह बंद है। एनालिस्ट्स का कहना है कि इसका मतलब यह हुआ कि जो देश अमेरिका की सैन्य कार्रवाई के साथ नहीं हैं, वोअपने जहाज होर्मुज की खाड़ी से भेज पाएंगे। हालांकि, इन जहाजों को ईरानी नौसेना के साथ तालमेल बिठाकर चलना होगा। अराघाची ने वॉशिंगटन के साथ किसी तरह की सीजफायर की डिमांड किए जाने से इनकार किया है। 
जयशंकर का इशारा क्या समझ पाएंगे ट्रंप
जयशंकर ने ट्रंप को इशारों ही इशारों में कहा कि सैन्य दबाव बनाने के मुकाबले शांत कूटनीति ज्यादा प्रभावी होती है। फाइनेंशियल टाइम्स को दिए एक इंटरव्यू में जयशंकर ने कहा-भारत के नजरिये से देखा जाए तो यह बेहतर होगा कि हम तालमेल बिठाएं और हम समाधान तक पहुंचें। मगर हम ऐसा नहीं कर रहे हैं। अगर हम दूसरे लोगों को भी इसमें शामिल करें तो मेरा मानना है कि दुनिया के लिए यह बेहतर होगा। 
जयशंकर के मशविरे की टाइमिंग बेहद अहम
भारतीय विदेश मंत्री एस जयशंकर ने कहा है कि युद्धपोत के बजाय कूटनीति ही होर्मुज स्ट्रेट खोलने का महत्वपूर्ण प्रभावी हथियार है। जयशंकर ने यह बात तब कही है, जब ट्रंप ने नाटो देशों समेत चीन, फ्रांस और ब्रिटेन को एक टीम एफर्ट के रूप में खाड़ी क्षेत्र में युद्धपोत भेजने की अपील की है ताकि होर्मुज को खोला जा सके।
फ्रांस और इटली ने शुरू की ईरान से बातचीत
यूरोपीय देश फिलहाल बातचीत के रास्ते तलाश रहे हैं। फ्रांस और इटली ने तो ईरान के साथ बातचीत भी शुरू कर दी है ताकि टैंकर के ट्रैफिक को बहाल किया जा सके। जयशंकर यह बातचीत तब कर रहे थे, जब यूरोपीय यूनियन के विदेश मंत्रियों की सोमवार को ब्रसेल्स में मीटिंग होने जा रही है। माना जा रहा है कि इस मीटिंग में भी होर्मुज के बंद होने को लेकर मुख्य चर्चा हो सकती है।
भारत के पास है ब्रिक्स की अध्यक्षता
दिसंबर 2025 से ही ब्रिक्स की अध्यक्षता भारत के पास आ गई है। आर्थिक संगठन 11 सदस्यीय ब्रिक्स का गठन 2009 में हुआ था। इसे व्यापक रूप से ग्लोबल साउथ भी कहा जाता है। इसे दुनिया के विकसित देशों के संगठन जी-7 का विकल्प भी माना जाता है।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप आरोप लगा चुके हैं ब्रिक्स के सदस्य देश एंटी अमेरिकन हैं। हालांकि, ब्रिक्स कह चुका है कि उसका गठन किसी और समूह के साथ कंपटीशन के लिए नहीं किया गया है।
ब्रिक्स में सदस्य देश: ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका ब्रिक्स के फाउंडर देश हैं। 2024 से ब्रिक्स का विस्तार किया गया है। इनमें इंडोनेशिया, इथियोपिया, मिस्र, ईरान, सऊदी अरब और यूनाइटेड अरब अमीरात भी शामिल किया गया।
होर्मुज स्ट्रेट की इतनी अहमियत क्यों है
होर्मुज स्ट्रेट ईरान और ओमान के बीच एक संकरा समुद्री गलियारा है, जहां से दुनिया का 20 फीसदी कच्चे तेलों की आवाजाही होती है।
होर्मुज से ही भारत के करीब 85 फीसदी कच्चे तेल और गैस के टैंकर सऊदी अरब, इराक या संयुक्त अरब अमीरात से गुजरते हैं।
एनर्जी लाइफलाइन होर्मुज से ही अमेरिका की खाड़ी देशों के तेल कारोबार को डॉलर से काबू करने की रणनीति को मजबूत बनाती है। 
-Legend News

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