दिल्ली हाई कोर्ट ने सत्य निकेतन इमारत हादसे को लेकर दायर उस याचिका पर आपत्ति जताई, जिसमें दावा किया गया था कि मलबे के नीचे अब भी कुछ लोग दबे हो सकते हैं.
बार एंड बेंच के अनुसार चीफ़ जस्टिस देवेंद्र कुमार उपाध्याय और जस्टिस तेजस कारिया की पीठ के समक्ष सोमवार को तत्काल सुनवाई की मांग की गई थी.
याचिकाकर्ता की ओर से दावा किया गया कि दिल्ली नगर निगम (एमसीडी) ने ढही इमारत से सटी एक इमारत को भी गिरा दिया, लेकिन मलबा हटाए बिना उसे ध्वस्त किया गया. याचिका में आशंका जताई गई कि मलबे के नीचे लोग अब भी फँसे हो सकते हैं.
समाचार एजेंसी पीटीआई के मुताबिक़ इस पर कोर्ट ने सवाल किया, "यह जानकारी किस आधार पर है कि मलबे के नीचे लोग हैं? आपको यह कैसे पता? पास की इमारत को गिराने का फ़ैसला लेने से पहले उन्होंने (अधिकारियों) किसी तरह की तकनीकी जाँच ज़रूर की होगी. यह आपका सिर्फ़ अंदाज़ा है कि वहां कुछ लोग हो सकते हैं. आपको ऐसी बात कहने के लिए कोई ठोस आधार होना चाहिए."
याचिका पर सुनवाई को लेकर कोर्ट ने कहा, "इतनी जल्दी क्या है? आपको बिना किसी आधार के याचिका दायर नहीं करनी चाहिए. आपके पास कौन-सी तकनीकी जानकारी है?"
गौरतलब है कि दिल्ली विश्वविद्यालय के साउथ कैंपस के पास सत्य निकेतन में स्थित इमारत 6 सितंबर को ढह गई थी. हादसे में सात लोगों की मौत हुई थी, जिनमें छात्र और मज़दूर भी शामिल थे.
इस मामले में दिल्ली हाई कोर्ट पहले से ही एक जनहित याचिका (पीआईएल) पर सुनवाई कर रहा है. इसमें हादसे में जान गँवाने वालों के परिजनों को एक-एक करोड़ रुपये मुआवज़ा देने और सभी पीजी आवासों-हॉस्टलों का स्ट्रक्चरल ऑडिट कराने की माँग की गई है. 
-Legend News

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