वृन्दावन। श्रीहरिदासबिहारीजी महाराज के अनन्यभक्त अमरशहीद पूज्यगोस्वामी श्रीरूपानन्दजी महाराज अब से 257 साल पहले सन् 1769 ईस्वी में 11 अप्रैल (चैत्र शुक्ला षष्ठी) के दिन आराध्यप्रभु श्रीबाँकेबिहारीजी महाराज को तमाम संघर्ष के बाबजूद राजस्थान से वापस वृन्दावन लाने में सफल रहे थे। संघर्ष में भीषण रुप से घायल हो चुके पूज्यगोस्वामी ठाकुरजी के श्रीविग्रह को समाज के हाथों सुरक्षित सौंपकर शहीद हो गए थे। तभी से प्रतिवर्ष 11 अप्रैल को भक्त समुदाय व सेवायत समाज पूज्यगोस्वामीजी का स्मृति महोत्सव मनाता चला आ रहा है।

उक्त उदगार अमरशहीद गोस्वामी रूपानन्द महाराज के वंशज आचार्य विप्रांशबल्लभ गोस्वामी ने आज शनिवार को प्राचीन श्रीहरिदासपीठ मंदिर में श्रीहरिदासबिहारी फाउंडेशन ट्रस्ट द्वारा आयोजित गोस्वामी श्रीरूपानन्द महाराज के 257 वें स्मृति महोत्सव के अवसर पर श्रीबाँकेबिहारीजी महाराज की वृन्दावन वापसी लीला का वर्णन करते हुए व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि प्रागट्यकाल से लेकर काफी लम्बे वक़्त तक  निधिवनराज में ही विराजमान रहने के बाद भगवान श्रीबाँकेबिहारीजी पुरानाशहर स्थित वर्तमान मंदिर के ही एक स्थान पर बने लघुमंदिर में विराजमान हुए थे।

आचार्यगोस्वामी के अनुसार उसी छोटे मंदिर में एक बार राजस्थान के करौली रियासत की तत्कालीन रानी भगवान के दर्शन करने आयीं। उस समय बिहारीजी मंदिर में पर्दा प्रथा का प्रचलन नहीं था, इस कारण रानी को टकटकी लगाकर भगवान के दर्शन करने की सुविधा प्राप्त हुई। बाँकेबिहारीजी के दर्शन करते-करते भक्तहृदया रानी का आंतरिक तारतम्य ठाकुरजी से इस कदर जुड़ गया कि मनोभावों के वशीभूत उन्होंने बिहारीजी को अपने संग चलने का स्नेह पूर्ण आमंत्रण दे दिया, जिसे स्वीकारते हुये भगवान ने एक अद्भुतलीला की पृष्ठभूमि तैयार कर दी। रानी के आवेदन पर बाँकेबिहारीजी सभी के देखते-देखते सिंहासन से उठे और मंदिर से बाहर खड़े राज्य के रथ में बैठ कर रानी के साथ चले गए। करौली जाकर अतिशीघ्र निर्मित हुये मंदिर में विराजमान होकर ठाकुरजी ने कई वर्षों तक वहाँ दर्शन दिए।

उन्होंने कहा कि अनेक घटनाक्रमों के पश्चात भरतपुर राज्य के सहयोग से गोस्वामीसमाज के सेनापति रूपानन्दजी के साथ सदैव रहने वाले 25 घुड़सवार गोस्वामियों के दल ने आराध्य को भरतपुर पहुंचाया, जहाँ भगवान काफ़ी वक़्त तक विराजित रहे। यहाँ से बिहारीजी को वृन्दावन लाने के दौरान भरतपुर राजघराने के सदस्य रतनसिंह की सेना और सेवायतों की सेना के बीच भयंकर संघर्ष हुआ, लेकिन रूपानन्दजी आराध्यप्रभु को वृन्दावन पहुंचाने में सफल रहे। हालांकि इस भीषण संघर्ष में एक ओर रतनसिंह की मृत्यु हुई तो दूसरी ओर रूपानन्दजी भी शहीद हो गए। इस प्रसंग के बाद बिहारीजी मंदिर में पर्दा प्रथा का चलन शुरू कर दिया गया, ताकि आगे ऐसी घटना घटित ही ना हो सके।

इससे पूर्व 257 वें स्मृतिमहोत्सव के शुभारम्भ में मुख्यअतिथि वरिष्ठ समाजसेवी राजकुमार खंडेलवाल, विशिष्टअतिथि श्रीबाँकेबिहारीजी के सेवायत डॉ. मधुर गोस्वामी एवं कार्यक्रम अध्यक्ष आशुकवि आचार्य प्रेमबल्लभ गोस्वामी ने विधिविधान पूर्वक पूजाअर्चना करते हुए दीपप्रज्वलन व माल्यार्पण किया। इस मौके पर राजकुमार खंडेलवाल ने कहा रूपानन्दजी जैसे बलिदानी सेवायत की स्मृति में मंदिर कमेटी द्वारा कोई भी कार्यक्रम आयोजित नहीं किए जाने से भक्तों को अत्यंत कष्ट होता है, कमेटी को ऐसे दिव्य महापुरुष की स्मृति में उद्देश्यपूर्ण कार्यक्रमों का आयोजन करना चाहिए। डॉ. मधुरबिहारी गोस्वामी ने ट्रस्ट की पूर्ववर्ती माँग दोहराते हुए कहा कि मंदिर प्रबंधन को श्रीरूपानन्द स्मृति स्थल को संरक्षक देकर वहाँ भव्य स्मारक का निर्माण करना चाहिए। आचार्य प्रेमबल्लभ गोस्वामी ने कहा कि वर्तमान पीढ़ी की ये जिम्मेदारी है कि वह आगामी पीढ़ियों को जानकारी प्रदान करे।

समारोह में ट्रस्ट संस्थापक इतिहासकार आचार्य प्रहलाद बल्लभ गोस्वामी, सचिव विजयलक्ष्मी गोस्वामी, गुंजन, निवेदिता, प्रवर्तिका, लक्ष्मणसिंह सहित अनेक लोग उपस्थित रहे। संचालन फाउंडेशन महासचिव रविंद्र तंवर ने एवं धन्यवाद ज्ञापन आचार्य नवलबिहारी गोस्वामी ने किया। समापन में ठाकुरजी तथा श्रीरूपानन्दजी महाराज की विशेषआरती उतारी गई व प्रसाद वितरित किया गया।

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